Ambala News | गुरु ग्रंथ साहिब के पहले प्रकाश पर्व पर संगत को बधाई : हरपाल सिंह पाली ने बताया पावन इतिहास | सर्वसाझी मानवता का संदेश

श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के पहले प्रकाश पर्व के अवसर पर हरपाल सिंह पाली ने देश-विदेश में रहने वाली संगत को बधाई देते हुए गुरु ग्रंथ साहिब जी के पावन इतिहास, गुरबाणी के महत्व और सर्वसाझी मानवता के संदेश पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि गुरु ग्रंथ साहिब जी की वाणी किसी एक जाति, वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी मानवता को समानता, सेवा और परमात्मा से जुड़ने का संदेश देती है।
हरपाल सिंह पाली ने कहा कि पंचम गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने विभिन्न गुरु साहिबानों और भक्तों की पावन वाणी को संकलित कर आदि ग्रंथ की संपादना करवाई। भाई गुरदास जी ने गुरु अर्जुन देव जी के निर्देशन में पावन बीड़ को लिपिबद्ध किया। इसके बाद वर्ष 1604 में सचखंड श्री हरमंदिर साहिब, अमृतसर में इसका पहला प्रकाश किया गया।

उन्होंने बताया कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की संपादना से जुड़ा महत्वपूर्ण कार्य अमृतसर की पावन धरती रामसर साहिब में हुआ था, जहां आज गुरुद्वारा रामसर साहिब सुशोभित है। पहला प्रकाश होने पर बाबा बुड्ढा जी को श्री हरमंदिर साहिब का पहला ग्रंथी नियुक्त किया गया।
हरपाल सिंह पाली ने पहले प्रकाश के अवसर पर लिए गए प्रथम हुक्मनामे का उल्लेख करते हुए बताया कि इसकी शुरुआत “संता के कारजि आपि खलोइआ...” पावन शब्द से हुई थी। उन्होंने कहा कि इस पावन संदेश में सेवा, विश्वास और परमात्मा की कृपा का भाव समाहित है और यही गुरबाणी की सर्वसाझी भावना को भी प्रकट करता है।
उन्होंने गुरबाणी के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि सिख परंपरा में वाणी को गुरु का स्वरूप माना गया है। गुरु ग्रंथ साहिब जी की शिक्षाएं मनुष्य को सत्य, सेवा, समानता, भाईचारे और परमात्मा के नाम से जुड़ने की प्रेरणा देती हैं। उनका कहना था कि इन शिक्षाओं की प्रासंगिकता किसी एक समय या समाज तक सीमित नहीं है।
उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज पावन वाणी की सर्वसाझी प्रकृति का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें गुरु साहिबानों के साथ विभिन्न संतों और भक्तों की वाणी भी शामिल है। यही कारण है कि इसका संदेश जाति-पाति और सामाजिक भेदभाव से ऊपर उठकर संपूर्ण मानवता को जोड़ने वाला है।
हरपाल सिंह पाली ने सिख इतिहास के अगले महत्वपूर्ण चरण का उल्लेख करते हुए बताया कि दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु तेग बहादुर साहिब जी की पावन वाणी को शामिल कर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूप को पूर्णता प्रदान की। इसके बाद वर्ष 1708 में नांदेड़ में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को शाश्वत गुरु का दर्जा देते हुए सिखों को गुरु ग्रंथ साहिब को ही गुरु मानने का आदेश दिया।
उन्होंने कहा कि गुरु ग्रंथ साहिब जी का संदेश पूरी दुनिया के लिए है। गुरबाणी मनुष्य को भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे का सम्मान करने, जरूरतमंद की सेवा करने और मानवता के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देती है। उन्होंने संगत से गुरु साहिब की शिक्षाओं को केवल सुनने तक सीमित नहीं रखने, बल्कि उन्हें जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
हरपाल सिंह पाली ने कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का पहला प्रकाश पर्व सिख इतिहास का महत्वपूर्ण अवसर है। यह दिन गुरबाणी के संदेश को समझने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने देश-विदेश में रहने वाली समस्त संगत को पहले प्रकाश पर्व की लाख-लाख बधाई देते हुए “वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह” के साथ अपना संदेश समाप्त किया।
Editor: शिवानी राजपूत



