Narnaul News | लॉजिस्टिक हब और माजरा AIIMS की जमीन पर सवाल : मुआवजे की तुलना | ‘एक हांडी के दो पेट’ पर बहस

दक्षिणी हरियाणा की दो बड़ी परियोजनाओं—बसीरपुर, घटाशेर और तलोट क्षेत्र के मल्टी मॉडल लॉजिस्टिक हब तथा रेवाड़ी के माजरा में प्रस्तावित AIIMS—के लिए किसानों से खरीदी गई जमीन और उसकी कीमत को लेकर एक बार फिर राजनीतिक एवं सार्वजनिक बहस तेज हो गई है। दोनों परियोजनाओं में जमीन की खरीद, उस समय के कलेक्टर रेट और किसानों को किए गए भुगतान की तुलना करते हुए सवाल उठाए जा रहे हैं कि समान प्रकृति की प्रक्रिया को अलग-अलग राजनीतिक नजरिये से क्यों देखा जा रहा है।
लॉजिस्टिक हब के लिए वर्ष 2017 में बसीरपुर, घटाशेर और तलोट क्षेत्र में किसानों से सहमति के आधार पर जमीन खरीदी गई थी। प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार उस समय बसीरपुर में बरानी भूमि का कलेक्टर रेट करीब 10 लाख रुपये प्रति एकड़ और चाही भूमि का करीब 12 लाख रुपये प्रति एकड़ था। किसानों को जमीन के बदले 30 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से भुगतान किया गया। कुछ किसानों ने अपनी जमीन बेचने से इनकार भी किया था और उनकी जमीन इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनी।

वहीं माजरा AIIMS के लिए वर्ष 2022 में किसानों से जमीन खरीदी गई। प्रस्तुत जानकारी के मुताबिक उस समय जमीन का कलेक्टर रेट करीब 24 लाख रुपये प्रति एकड़ था, जबकि किसानों को 40 लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से भुगतान किया गया।
इन्हीं आंकड़ों के आधार पर अब दोनों परियोजनाओं की तुलना की जा रही है। सवाल यह उठाया जा रहा है कि यदि लॉजिस्टिक हब के लिए जमीन की कीमत का मूल्यांकन भूमि अधिग्रहण, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 के मानकों से किया जाता है तो माजरा AIIMS की जमीन के मामले में भी उसी आधार पर तुलना होनी चाहिए।

मामले में यह भी तर्क दिया गया है कि लॉजिस्टिक हब की जमीन खरीद को लेकर पूर्व विधायक डॉ. अभय सिंह यादव पर समय-समय पर राजनीतिक आरोप लगाए गए। विशेष रूप से किसानों को 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के अनुसार कीमत नहीं मिलने का मुद्दा उठाया गया। वहीं दूसरी ओर माजरा AIIMS के लिए जमीन खरीद की प्रक्रिया और भुगतान को लेकर उसी पैमाने पर सार्वजनिक चर्चा नहीं होने का सवाल उठाया गया है।
इस तुलना में मुख्य प्रश्न किसानों को मिले वास्तविक भुगतान और तत्कालीन कलेक्टर रेट के अनुपात को लेकर है। लॉजिस्टिक हब के मामले में 10 से 12 लाख रुपये प्रति एकड़ के कलेक्टर रेट के मुकाबले 30 लाख रुपये प्रति एकड़ भुगतान का आंकड़ा दिया गया है। माजरा AIIMS के मामले में 24 लाख रुपये प्रति एकड़ कलेक्टर रेट के मुकाबले 40 लाख रुपये प्रति एकड़ भुगतान बताया गया है।

हालांकि केवल कलेक्टर रेट और अंतिम खरीद मूल्य की तुलना से यह कानूनी रूप से तय नहीं किया जा सकता कि किसी विशेष जमीन के लिए 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत कितना मुआवजा बनता। इसकी गणना में जमीन की स्थिति, लागू गुणक, बाजार मूल्य निर्धारण, सोलैटियम और संबंधित वैधानिक प्रावधानों सहित कई पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं। साथ ही सरकार द्वारा सहमति से सीधे जमीन खरीदने और औपचारिक भूमि अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रिया एवं शर्तें भी अलग हो सकती हैं। इसलिए किसी भी पक्ष पर भ्रष्टाचार या किसानों से धोखे का निष्कर्ष केवल इन दो आंकड़ों के आधार पर निकालना उचित नहीं होगा।
लेख में एक वरिष्ठ पत्रकार द्वारा लॉजिस्टिक हब जमीन मामले में किसी नेता के लिए कथित तौर पर ‘खलनायक’ शब्द इस्तेमाल करने पर भी आपत्ति जताई गई है। तर्क दिया गया है कि पत्रकारिता में किसी व्यक्ति के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले दोनों परियोजनाओं की जमीन खरीद प्रक्रिया, सरकारी रिकॉर्ड और लागू कानूनी प्रावधानों की समान पैमाने पर जांच होनी चाहिए।

वर्ष 2024 के हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद क्षेत्र की राजनीतिक परिस्थितियां भी बदलीं। नांगल चौधरी से तत्कालीन विधायक डॉ. अभय सिंह यादव चुनाव हार गए, जबकि अटेली से केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी आरती सिंह राव चुनाव जीतकर हरियाणा सरकार में मंत्री बनीं। इसके बाद लॉजिस्टिक हब से जुड़े जमीन के मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी सामने आती रही है।
इस पूरे विवाद का केंद्रीय सवाल यही है कि बसीरपुर और माजरा की जमीन के मूल्यांकन के लिए क्या समान कानूनी और आर्थिक कसौटी अपनाई जा रही है। यदि 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून को तुलना का आधार बनाया जाता है तो दोनों परियोजनाओं के तत्कालीन सरकारी रिकॉर्ड, कलेक्टर रेट, जमीन की श्रेणी, खरीद की कानूनी प्रक्रिया और किसानों को मिले भुगतान का स्वतंत्र एवं समान आधार पर आकलन जरूरी होगा।

लॉजिस्टिक हब की शेष जमीन को लेकर भी तर्क दिया गया है कि यदि सरकार भविष्य में औपचारिक रूप से भूमि अधिग्रहण करती है तो उस समय लागू कानून और नियमों के अनुसार मुआवजा निर्धारित करना होगा। क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए किसानों और सरकार के बीच लंबित मुद्दों का कानूनी एवं तथ्यात्मक आधार पर समाधान जरूरी है।



